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05.03.2012
 

ग़ज़ल का निर्झर
प्राण शर्मा - ग़ज़लकार


कहानी, व्यंग्य, कविता, बालगीत और शोध आदि की अनेक उल्लेखनीय कृतियों के रचयिता डॉ. गौतम सचदेव पर कुछ भी कहना-लिखना मेरे लिए गौरव की बात है। वे ऐसे प्रखर रचनाकार हैं, जिनपर बहुत कुछ लिखा जा सकत है। बहुत देर बाद मुझको इस बात का पता चला कि वे एक बढ़िया ग़ज़लकार भी हैं और उनकी लेखनी से ग़ज़लों की निर्झरिणी फूटती है।

उधर याद निकली हुई दीमकों-सी

इधर दिल की भीगी है पोथी पुरानी

बहुत कुछ कहे जाने वाले इस शेर के रचयिता डॉ. गौतम सचदेव का नाम बड़े सम्मान के साथ  लिए जाने योग्य है। इसलिए नहीं कि उन्होंने ढेर सारी कविताएँ और ग़ज़लें लिखी हैं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उर्दू बह्रों में हिन्दी छन्दों की अस्मिता और गरिमा को बरक़रार रखते हुए हिन्दी छन्द विधान का निष्ठा से पालन किया है। हिन्दी छन्दों की भाँति उर्दू बह्रों पर भी उनका पूरा अधिकार है। इसीलिए तो वे उर्दू की मुश्किल से मुश्किल बह्र को बड़ी आसानी से निभा जाते हैं। डॉ. गौतम सचदेव द्वारा प्रयुक्त उर्दू क बह्रों से हिन्दी के छन्दों जैसी सुगन्ध का आना उनके कौशल का परिचायक है। उनकी ग़ज़लों में बह्रों और छन्दों का मिला जुला रूप चमत्कार पैदा करता हुआ नज़र आता है

मान ले विनती सवेरे की हवा

कुछ बढ़ा दे और ख़ुश्बूदार दिन

इस शेर में कितनी सादगी से, मधुरता और गहराई है। उनके गीतों और उनकी कविताओं में ऐसी पंक्तियाँ स्वतः आ जाती हैं, जो किसी ख़ूबसूरत शेर की तरह केवल सिर पर चढ़कर बोलती ही नहीं, दिल में गहरे उतरती भी हैं। सूरदास का दोहा है

बाँह छुड़ाये जात हो निबल जानि के मोहि।

हिरदे तैं जब जाओगे सबल बदौंगो तोह॥

इसमें सूरदास ने कितने सरल और सहज ढंग से भगवान्‌ कृष्ण के प्रति अनुराग को व्यक्त किय है। डॉ. गौतम सचदेव के दोहों में इसी तरह की सरलता और सहज सुन्दरता के दर्शन होते हैं और वे छ्न्द-विधान की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। दोहे पर मोहे... नामक कथात्मक कविता का दोहा है

रँगरेज़िन ने कर दिया क्या अद्‌भुत बदलाव।

आधा आधे से मिला शतगुण हुआ प्रभाव॥

डॉ. गौतम सचदेव की ऐसी कितनी ही पंक्तियाँ हैं, जो अच्छे से अच्छे शेर को मात देती हैं। इसी तरह उनकी भारत-विभाजन पर लिखी लम्बी कविता पलायनभी ग़ज़ल से क़तई कम नहीं है। इस कविता की प्रत्येक पंक्ति शेर के मिस्रे जैसी तासीर पैदा करती है। उदाहरण के लिए

जुर्म क्या था किस लिए हमको जलावतनी मिली

फिर्न न जा सकते उधर घर छोड़कर जब हम चले

देश छोटा हो गया पर हो गये नेता बड़े

सब गये वादे मुकर घर छोड़कर जब हम चले

इस कविता में इतना यथार्थ है कि विभाजन की त्रासदी के छः दशक बाद भी उसके हृदय-विदारक दृश्यों के माध्यम से उसकी पीड़ा को महसूस किया जा सकता है

माँ अलग बच्चे अलग अपने न जाने थे कहाँ

मौत ही थी हमसफ़र घर छोड़कर जब हम चले

नस्ल सबकी एक थी खूँख़्वार थे सब एक-से

गिद्ध कुत्ते और नर घर छोड़कर जब हम चले

उर्दू का एक शब्द है आमद यानि विचार या भाव का अपने-आप फूटना। डॉ. गौतम सचदेव की ग़ज़लों में यह आमद जगह-जगह लक्षित होती है। उनकी ग़ज़लें इसलिए भी मर्मस्पर्शी हैं, क्योंकि इनमें कहीं नदी का सहज बहाव है, कहीं पहाड़ों से फूटते हुए झरनों की फुहार है और कहीं बसंत की भीनी-भीनी बयार है। इनमें कहीं पर भी तालाब के पानी जैसा ठहराव नहीं है। कहीं ये होली के रंग में चुटकियाँ लेती हैं, तो कहीं इनका व्यंग्य दुधारी तलवार की तरह काटता है

मौसम से मिलने को आतुर हरियाली का घूँघट खींच

पतझड़ ने करके बरजोरी सब-का-सब झकझोरा रंग

अव्वल तो छप न पाये लुट जाये गर छपे

हिन्दी का य ह बिचारा कैसा अदीब है

डॉ. गौतम सचदेव की ग़ज़लें हों या कविताएँ, उनमें न केवल कल्पना की ऊँची उड़ान है, बल्कि युग का उल्लास और रुदन भी है।


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