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05.03.2012

 
बूँद-बूँद आकाश  
डॉ. गौतम सचदेव  

प्रकाशक  :
उपासना पब्लिकेशन्स
डी-१०/१०६१ (समीप श्रीमहागौरी मन्दिर)
खजूरी खास, दिल्ली-११००९४
दूरभाष : 22967638
ISBN : 81-901914-1-1
सम्पर्क : drgsachdev@aol.com

समर्पण :

दिवंगत पिता श्री हीरा नन्द की
स्मृति में
जिनसे तुकबंदी करना सीखा

बूँदों से पहले मेघ
डॉ. गौतम सचदेव

 बूँद-बूँद आकाश में मेरी छ्न्दोबद्ध रचनाएँ हैं, जो पिछले एक दशक में समय-समय पर लिखी गईं। स्वच्छन्द या मुक्त छ्न्द में कविता लिखने के अतिरिक्त मैं यदा-कदा छन्द में बँध जाता हूँ, क्योंकि मुझे ये बन्धन अच्छे लगते हैं। मैं मानता हूँ कि कविता चाहे मुक्त छन्द की हो या छन्दोबद्ध, वह अगर लय ताल में नहीं, तो काव्यात्मक शब्दों में अवश्य बँधी होती है। कवि की मुक्ति केवल भावों, विचारों और कल्पनाओं की अभिव्यक्ति में है, लेकिन वह पूर्ण मुक्ति कहाँ है? अभिव्यक्ति की कुछ निजी सीमाएँ तो रहेंगी ही। कला चाहे कोई हो, उसमें पूर्ण अभिव्यक्ति शायद कभी नहीं हो पाती। कुछ न कुछ शेष रह जाता है, जो फिर-फिर नये रूपों में प्रकट होना चाहता है।

छ्न्दोबद्ध होने के कारण मेरी प्रस्तुत रचनाओं को ग़ज़ल, गीत और कविता जैसे ख़ानों बाँटकर देखा जा सकता है, लेकिन मैंने उर्दू ग़ज़ल और क़ायदे क़ानूनों का पालन नहीं किया है, क्योंकि मैंने उर्दू बह्रों के स्थान पर हिन्दी के छन्दों को अपनाया है। अगर कहीं उर्दू बह्रों की छाया विद्यामान है, तो वह अनायास आई है। आज हिन्दी ग़ज़ल काफ़ी प्रचलित और लोकप्रिय है, लेकिन हिन्दी के रचनाकारों का इसके छन्द के विषय में कोई निश्चित गत नहीं है। मेरे विचार में हिन्दी ग़ज़ल के लिए मात्रिक छन्द सर्वाधिक उपयुक्त हैं। इनसे ने केवल हिन्दी की अपनी प्रकृति और स्वरूप ही बने रहते हैं, बल्कि वर्तनी और सन्तुलन भी ठीक रहते हैं। उर्दू में यह सुविधा है कि वज़न या सन्तुलन के लिए शब्दों को छोटा-बड़ा किया जा सकता है। जैसे नादान, आस्मान, मेरा, ख़ामोशी, अगर आदि शब्द क्रमशः नादाँ, आस्माँ, मिरा, ख़ामशी और गर भी लिखे जाते हैं। ख़ामोशी के तो ख़ामुशी और ख़मोशी रूप भी सही हैं। यही नहीं, पढ़ते समय उर्दू के शब्दों को तोड़कर वज़न मिलाया जा सकता है। हिन्दी साहित्य के आदि-काल, भक्ति-काल, और रीति-काल में शब्दों को तोड़-मरोड़कर मात्राएँ ज़रूर पूरी की जाती थीं, लेकिन आधुनिक कविता में न तो यह उचित माना जाता है और न ही ऐसा करने का चलन है।

मैंने सामान्यतः हिन्दी शब्दों का प्रयोग किया है, लेकिन कहीं-कहीं छन्द और अनुप्रास के आग्रह के कारण उर्दू शब्द भी उनकी मूल वर्तनी के अनुसार लिये हैं। मेरे लिये यह एक तरह से स्वाभाविक था, क्योंकि जहाँ पंजाबी मेरी मातृभाषा है, वहीं उर्दू मेरी पितृभाषा है। उर्दू के सैंकड़ों शब्द यों भी हिन्दी बोलचाल में प्रचलित और स्वीकृत हैं और इनसे हिन्दी के शब्द भंडार की खूब वृद्धि हुई है।

बूँद-बूँद आकाश में समसया पूर्ति की शैली ई दो तरही ग़ज़लें भी हैं, जो मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रसिद्ध ग़ज़लों जहाँ तेरा नक़्शें क़दम देखते हैं और ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाले यार होता के मिस्रों पर लिखी गई हैं। ग़ालिब का प्रशंसक होने के नाते उनके लिये ये मेरे दो श्रद्धा-सुमन हैं।