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05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
099

हों भले तारे अँधेरा घुप हुआ आकाश मेरा

हों भले तारे अँधेरा घुप हुआ आकाश मेरा
स्वप्न मेरा बना गया है नाग जैसा पाश मेरा

गीत के स्वर झर गये हैं
ठूँठ जैसा कर गये हैं
साथ मेरा दे ने पायेगा मधुर अभिलाष मेरा

हो गये हैं शब्द बहरे
अर्थ पर बेदर्द पहरे
भुरभुरा कर गिर गया है विश्वास का कैलाश मेरा

दर्द से आहें सनी हैं
याद की किरचें तनी हैं
और कितनी बार करना चाहता दिल नाश मेरा

कामना के वार पैने
खोलने पाऊँ न डैने
जाल के बिन न दाना सिर्फ़ होता काश मेरा

काफ़िला गुज़रा समय का
भय पराजय का न जय का
साथ देता है अकेला कसकता अवकाश मेरा


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