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05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
098

तेरी दुनिया जब चाहे तू

तेरी दुनिया जब चाहे तू करता मनमानी जी भर
कौन कहे मालिक तुझसे तू ऐसा कर या वैसा कर

क्यों अपनी तारीफ़ कराने को रहता है तू तत्पर
पूजा करे न तेरी जो भी लगता है क्यों उसको डर

ख़ूब जगाता सपने सब में कच्ची कलियाँ मसले फिर
तू करता अपने जी की हम कहते क़िस्मत का चक्कर

छप्पर फाड़ किसी को देता रख कुछ को भूखा बेघर
क्यों बरते यह भेदभाव तू बतला कुछ तो ज़ोरावर

कर्मों का फल होता देना कर्त्ता को ही सदा उचित
कर्म किसी ने किये कौन-से यह भी तो बतलाया कर

"गौतम" नहीं नास्तिक लेकिन पूछे तुझसे उसका दिल
प्रेम दया की मूरत मानें या तुजको ज़ालिम बर्बर


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