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05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
097

सम्भव नहीं शिवलिंग या शंकर बने रहें

सम्भव नहीं शिवलिंग या शंकर बने रहें
हम सीढ़ियों के किस तरह पत्थर बने रहें

कुछ औरो चाहे हों न हों इनसान तो बनें
या नेकियों की बाड़ के थूहर बने रहें

इनसान का हो क़त्ल तो भगवान भी मरे
समझें नहीं जो धर्म के ख़ंजर बने रहें

इन क़ातिलों को स्वर्ग क्यों देता है ऐ ख़ुदा
क्यों ख़ून के इनके लिए अवसर बने रहें

आँखें क़लम की मूँद कर लिखना फ़िजूल है
ललकारते हों ज़ुल्म को अक्षर बने रहें

दिल हो मगर दीवार क्यों बन जाय वह कहीं
टूटे जहाँ यह प्यार के छप्पर बने रहें

कितनी अनोखी चीज़ है ये ख़्वाब प्यार के
टूटें अगर बाहर कहीं अन्दर बने रहें

जपते हुए हरिनाम क्यों दिल में न यह उठे
अन्दर कहीं हरिद्वार या पुष्कर बने रहें


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