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05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
096

चमन में आ गये मौसम

चमन में आ गये मौसम सदा आँखें भिगोने के*
सँभाले बंदरों ने काम अब रखने सँजोने के

खिलें चंद पेड़ों पर चुराये फूल सोने के
मगर देंगे भला क्या ठूँठ पत्ते ख़ुश्क दोने के

बनाकर दीप लाशों के व मरघट तेल के कुएँ
लगा दी आग ज़ालिम ने मिटे अहसास होने के

चिकित्सा बिन पड़े रोगी तड़पते चीख़ते ज़ख़्मी
लुटे दिन छिन गई रातें मरे हैं वक़्त सोने के

बना बारूद कण-कण को व सींचा ख़ून महज़ब से
हकीमों ने लिखे नुस्ख़े ज़हर के बीज बोने के

बनाकर फ़ौज पाखंडी उठा हथियार झूठों के
किए छल मतलबी ने और नाटक पाप धोने के

विदेशों के विधाता ने गढ़े क्या ख़ूब कठपुतले
बनाये देश के नेता मगर होने-न-होने के

उन्हें फ़िक्र हो जिनको मिलें हमदर्द ख़ुद ऐसे
सुना है बड़े उस्ताद हैं लुटिया डुबोने के

*इराक की दशा से प्रेरित


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