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05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
095

नया नीतिशतक

मेरी भव बाधा हरो राधा नागरि सोय।
सिमरन करते ही सदा जो काला धन धोय॥१॥
माली आवत देखके कलियाँ करें पुकार।
नेता डालें कंठ में गूँथो ऐसा हार॥२॥
माला फेरत युग गया मिटा न मन का फेर।
नारे ख़ूब लगाय के जनता का मन फेर॥३॥
पोथी पढ़ पढ़ ज्ग मुआ पंडित भया न कोय।
ढाई आखर घूस के पढ़े सो पंडित होय॥४॥
लाली मेरे लाल की ऊपर ऊपर लाल।
ज्यों कालिख पर हों पुते मेहँदी और गुलाल॥५॥
रहिमन कुर्सी राखिये बिन कुर्सी सब सून।
कुर्सी से उजले बनें चोरी रिश्वत ख़ून॥६॥
जग में बँधते हैं वही जो हैं खर पतवार।
दास कबीरा क्यों बँधे गुंडे नेता यार॥७॥
आये हैं सो जायेंगे राजा रंक फ़कीर।
यही देख मरने लगा सबका नित्य ज़मीर॥८॥
जप माला छापा तिलक केवल जय जय राम।
सत्ता धन इनसे मिलें धर्म बढ़े बल धाम॥९॥
वृक्ष नहीं निज फल चखे नदी न संचय नीर।
विषमय पर्यावरण से बचने की तदबीर॥१०॥
आये दिन मतदान के नेता में उत्साह।
वादे मुद्दे ढूँढकर लाता नित्य अथाह॥११॥
उत्तम नेता है वही जिसका सूप सुभाय।
"सीट-सीट" को गहि रहै वादे देत उड़ाय॥१२॥
झूठे सुख संसार में सच्चा सुख है "सीट"।
"सीट बिना नर हो रहे गर्दभ कूकर कीट॥१३॥
तुलसी इस संसार को छोड़ेगा क्यों कोय।
कंचन कुर्सी कामिनी काया का सुख होय॥१४॥
माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहिं।
आँखें माया में फिरें सत्य धर्म कहलाहिं॥१५॥
प्रभु नेता दोनों खड़े किसके लागूँ पाँय।
राजनीति तुम धन्य हो दोनों दिये मिलाय॥१६॥
आशा पर अटके रहें वे नर केवल "फ़ूल"।
जोड़ तोड़ से जन गुणी करते सब अनुकूल॥१७॥
छुटभैये नेता भये कोलाहल जनवीर।
दुखियारे मस्तक घिसें प्यादे बने वज़ीर॥१८॥
वाह-वाह की चाह रख लाज शरम से दूर।
अपनी डफली ख़ुद बजा होगा तब मशहूर॥१९॥
मैं मैं बहुत सुहावनी करो मचाकर शोर।
वर्षा ऋतु में जिस तरह पंख पसारे मोर॥२०॥
नाम कमाने के लिए ख़ूब बजा तू ढोल।
नाम रतन धन पाय के मंच सजाकर बोल॥२१॥
सभी रसायन झूठ हैं नहीं नाम सम कोय।
मिले जवानी नाम से नेता कंचन होय॥२२॥
कारज धीरे होत है काहे होत अधीर।
सुलझेगा सौ जन्म में विकट प्रश्न कश्मीर॥२३॥
धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय।
पाँच बरस की योजना सौ में पूरी होय॥२४॥
गंदा भी है भ्रष्ट भी निर्धन आलीशान।
चींटी जैसी चाल है भारत देश महान॥२५॥
अवगुन बिन पूछे नहीं जग में कोई आज।
निकले पूत कपूत तो पिता करत है नाज़॥२६॥
साईं इतना दीजिए जिसमें कुटुम्ब समायँ।
मैं अरु अगली पीढ़ियाँ बैठे-बैठे खायँ॥२७॥
मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सब तोर।
दिन में बोलो ये वचन रातों-रात बटोर॥२८॥
जब हरि थे तब हम नहीं अब हम हैं हरी नायँ।
हमने प्रतिमा "ब्लैक" से उसकी दी लगवाय॥२९॥
रहे श्याम धन "ब्लैक" में ज्यों फूलों में बास।
करो "ब्लैक" पूजा मिले बंगलों में मधुवास॥३०॥
तुलसी इस संसार में सबसे मिलिये धाय।
क्या जाने किस भेस में अगला नेता आय॥३१॥
जोड़-तोड़ करके हुए समरथ जग के लोग।
मेल मिलावट के नये हंस सराहन योग॥३२॥
हाकिम जब बनिया बने सहज करे व्यापार।
बिन डंडी पलड़े बिना लाखों करदे पार॥३३॥
जिसको राखे साइयाँ मरे नहीं कर भूल।
गुंडे मिलकर पुलिस से हफ़्ता करें वसूल॥३४॥
साईं तुझसे छिप-छिपा कौड़ी नहीं बिकाय।
जिसके सिर नेता पुलिस भरत तिजोरी जाय॥३५॥
शब्द बराबर धन नहींण नेता जाने मोल।
भाषण-चादर तान के ढक ले अपनी पोल॥३६॥
नमक घुला पानी बना फिर नहिं दीखे आन।
राजनीति के नोन का इससे उलट बखान॥३७॥
कहकर भी कहते रहो अब कुछ कहा न जाय।
नये मौन का व्रत यही बोल मोल बढ़ जाय॥३८॥
चहुँ दिश दमके दामिनी बादल गहर गँभीर।
वर्षा नेता लायेगा करता है तक़रीर॥३९॥
बिन खोजे वे पायेंगे मारें गहरे हाथ।
मेहनत ही करता रहे मरता वही अनाथ॥४०॥
भूखा सत्ता के लिए नेता गिरगिट भेस।
रहे लिसोढ़े की तरह चिपके यथा सरेस॥४१॥
जनसेवक होता वही करता फिरे बखान।
शासन मैं कर सकूँ या मेरी सन्तान॥४२॥
पाकर चिपका ही रहे रसना भोगे स्वाद।
पद पदवी का रस चखे जनता का उस्ताद॥४३॥
गगन गरज जनतन्त्र में कंचन बरसे नीर।
दो कौड़ी के थे कभी रातों-रात अमीर॥४४॥
दीपक जोया ज्ञान का करे अँधेरा दूर।
सेवा बिन मेवा मिले फिर क्यों बनो मजूर॥४५॥
पानी ही से हिम बना हिम को लेउ लगाय।
टिकट न दे दल से कहो ठेका ही दिलवाय॥४६॥
कबिरा भरम बढ़ाय के बहु विधि धारो भेख।
मुट्ठी में सब कुछ करो क्या पंडित क्या शेख॥४७॥
ज्यों गूँगे के सैन को गूँगा ही पहचान।
त्यों चोरों के गुर सभी चोरों से लो जान॥४८॥
गुन को कोई न गहे अवगुन ही ले बीन।
माखी ज्यों विष्टा गहे माने गन्ध नवीन॥४९॥
सम दृष्टि सत गुरु किया मेटा जगत विकार।
जित देखूँ तित वंश ही दिखते नम्बरदार॥५०॥
सुनी लिखी तो है नहीं आँखिन देखी बात।
दुर्जन सँग सत्ता भगी बैठी रहे बरात॥५१॥
हम मानत हैं खायेंगे जीवन भर तर माल।
छीन झपट घर भर लिया शायद पड़े अकाल॥५२॥
जंगल में लकड़ी कटी थूनी करे पुकार।
बचना कठिन कुठार से अफ़सर हिस्सेदार॥५३॥
कल ठगना है आज ठग आज ठगे सो अब्ब।
पल में परलै होयगी और ठगेगा कब्ब॥५४॥
कबिरा नौबत आपनी दस दिन लेहु बजाय।
कुर्सी मौक़ा सम्पदा रोज़ न मिलते आय॥५५॥
जब भी हो जाये कहीं घटना या संयोग।
जनता को उल्लू बना बिठा जाँच आयोग॥५६॥
पाँचों नौबत बाजती फैल रही है साख॥
ढोंग महातम का किया दुनिया पूजे राख॥५७॥
कबिरा गर्व ही किजिये पा जोबन की शान।
ऐश कभी मत छोड़िए जब तक घट में प्रान॥५८॥
ऐसा यह संसार है जैसा सेमर फूल।
तितली भौंरे फाँस लो फिर तो मिलन धूल॥५९॥
माटी कहे कुम्हार से तू क्या रूँधे मोय।
ठेके में लग लूँ ज़रा तब रूँधूँगी तोय॥६०॥
कबिरा यह तन जा रहा अवसर को मत छोड़।
उल्टी-सीधी चाल से जोड़ सके जो जोड़॥६१॥
दुर्लभ मानुष जन्म है देह न बारम्बार।
भोग सुखों की लॉटरी खाकर भूल उधार॥६२॥
आस-पास जोधा खड़े सभी बजावें गाल।
धूल झोंक कर आँख में चल तू अपनी चाल॥६३॥
निशि वासर सुख ही रहे औ सुख सपने माँह।
जिसकी गाड़ी चल रही पकड़ो उसकी बाँह॥६४॥
ऐसी जुगत निकालिए काला धाल दिखाय।
पाप दिखे ज्यों पुण्य है सब कलंक धुल जाय॥६५॥
कबिरा दुनिया माट है मन्थन समुझे कोय।
औरन को मट्ठा बना मक्खन लेत बिलोय॥६६॥
बकरी पाती खात है तभी खिंचाती खाल।
नर के भक्षक जगत में होते मालामाल॥६७॥
फोड़ो आँख विवेक की भूलो सन्त-असन्त।
पट्ठे बढ़िया पालकर भोगो नित्य वसन्त॥६८॥
कामी क्रोधी लालची यही भगत अब होय।
सच्चा साधू सन्त है मालपुए खा सोय॥६९॥
भगती है चौगान-सी कन्दुक माला जाप।
चेला अश्व बनाय के काटो भव त्रय ताप॥७०॥
जल मछली की जान है लोभी की है दाम।
माता की सन्तान है हाकिम "सीट" सलाम॥७१॥
मिला माफ़िया संग तो तस्कर रख लो यार।
ऐश करो परदेश में बनकर साहूकार॥७२॥
पहिले बुरा कमाय के बाँधो विष की मोट।
हिस्सा दे भगवना को माफ़ कराओ खोट॥७३॥
काम क्रोध मद लोभ की जब तक घट में खान।
तब तक भगवा भेस धर बन जाओ भगवान॥७४॥
कोटि भरम चाहे करे होवे भरा विकार।
वही सराहा जायेगा जिसमें है हंकार॥७५॥
मैं भौंरे से कह रहा बास बनों की लेय।
फूलों का रस चूस ले धेला एक न देय॥७६॥
लाला "टैक्स" न दीजिये करके हर व्यापार।
धरो मुनाफ़ा जेब में झक मारे सरकार॥७७॥
चलती चक्की देख के कबिरा प्रमुदित होय।
दो पाटों में पीस लो दुनिया जो भी बोय॥७८॥
फूल बोय तेरे लिए बो उसके तू शूल।
तुझे हार पहनाय जब उसको सौंप बबूल॥७९॥
दुर्बल को दुख दीजिए समरथ कर अनुकूल।
लाठी सिर पर ही पड़े कुचले जाते फूल॥८०॥
इस दुनिया में आ गया छोड़ नहीं तू ऐंठ।
ले ले धौंस जमाय के उठी जात है पैंठ॥८१॥
ऐसी बानी बोलिये दिल को देवे चीर।
अपना मन शीतल करे दूजे की नक्सीर॥८२॥
हाथी चढ़ ले ज्ञान के बन जा तू बटमार।
श्वान रूप संसार है भूँकन दे झक मार॥८३॥
मतलब अपना साध ले बन कूकर या भेड़।
तुझे पराई क्या पड़ी अपनी आप निबेड़॥८४॥
आती गाली एक है पलटी बने अनेक।
कह कबीर गाली बको बनो कभी मत नेक॥८५॥
बहता बहने दे सदा नहीं बचा ला कूल।
जिसे डूबना डूब ले कीचड़ हो या धूल॥८६॥
सकल बुराई पास रख बढ़िया जनम बिताय।
कौए के निज भेस को बनकर हंस छिपाय॥८७॥
अपने पहरे जागिए मत पड़ रहिए सोय।
पुलिस मिली है चोर से जो सोये सो खोय॥८८॥
अन्न अधिक ले पेट से तन से बढ़कर चीर।
कोठे भर-भर कर जमा दुनिया कहे फ़कीर॥८९॥
डटकर खा तर माल तू सो जा लम्बी तान।
अपने घर कर रोशनी जग होवे शमशान॥९०॥
चमचे नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय।
नित तारीफ़ कराइये विज्ञापन छपवाय॥९१॥
दोष पराया देखकर ख़ूब मचाओ शोर।
अपने अवगुण को कहो गुण ही गुण घनघोर॥९२॥
झूठ बराबर तप नहीं सत्य बराबर पाप।
जाके दिल में झूठ है दाता माई-बाप॥९३॥
चिकनी चुपड़ी हड़प ले लोटे गटक शराब।
गर उधार चढ़ जाय तो दाता का मुख दाब॥९४॥
मन के पीछे ही चलो मन आनन्द अनेक।
जो मन चढ़कर चले दुख को देता फेंक॥९५॥
ओछे जग में हैं बड़े ऊँचे ज्यों मीनार।
शासक बनने के लिए नित्य लगा दरबार॥९६॥
जाति पाँति शोभित सदा ज्यों जंगल में घास।
भेद मिटाकर मत करो जग का सत्यानास॥९७॥
लड़ो धरम के नाम पर बनो धरम निरपेख।
"वोट बैंक" खुल जाएँगे मन्दिर मस्जित देख॥९८॥
बकते हैं जो कह रहे हिन्दी है सिरमौर।
अंगरेज़ी पढ़-पढ़ करो उनके दुख पर ग़ौर॥९९॥
धोती-कुर्ते में पड़ी हिन्दी बिन पतलून।
"नेल कटर" इंग्लिश पकड़ काटो यह नाख़ून॥१००॥
योगा वेदा इंडिया बुद्धा को कर याद।
केवल इंग्लिश में पढ़ो इन सबके अनुवाद॥१०१॥
छोड़ पुरातन पन्थ को चलो विदेशी गैल।
मोटर पश्चिम की भली चाम योग है बैल॥१०२॥
नीति नई ज्ग की यही गुरुजन वाणी सार।
जनसेवा छिलका निरा गूदा निज उपकार॥१०३॥
नीतिशतक नवनीत है जीवन अनुभव गूढ़।
समझेगा मतिमान ही सिर फोड़े निज मूढ़॥१०४॥


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