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05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
094

अलविदा दिल्ली तुम्हारा आस्माँ

अलविदा दिल्ली तुम्हारा आस्माँ
अलविदा दमघोंट ज़हरीला धुआँ
अलविदा फ़ैशन भरी तन्हाइयाँ
अलविदा मतलब भरी रुसवाइयाँ
अलविदा मेले नुमाइश शोरगुल
अलविदा बेकार के जल्से बिगुल
अलविदा दिल्ली की ज़िंदा महफ़िलें
अलविदा मुर्दा बनातीं मुश्किलें
अलविदा धक्कों से ठिलती ज़िंदगी
अलविदा दौलत ढकी बेपर्दगी
अलविदा वे तंग गलियाँ क़ैद बू
अलविदा बिजली बिना गरमी व लू
अलविदा देवासुरी सब मोटरें
अलविदा वे जानलेवा टक्करें
अलविदा रिक्शा व ताँगों की ज़बाँ
अलविदा कुढ़ती हुई ख़ामोशियाँ
अलविदा वह भीड़ का मारा शहर
अलविदा सस्ती मिलावट का ज़हर
अलविदा फ़ुटपाथ भिखमंगों के दिल
अलविदा वे झुग्गियाँ चूहों के बिल
अलविदा उजड़े दिखें आबाद भी
अलविदा बरबाद का उन्माद भी
अलविदा हर छेड़खानी हर चुहल
अलविदा कुछ हो न दिल जाए बहल
अलविदा वह पागलों-सी चिल्ल-पों
अलविदा झगड़े बहस क्या और क्यों
अलविदा मतलब-परस्ती दिल्लगी
अलविदा ईमान की साथिन ठगी
अलविदा संसद व दफ़्तर ग़ज़ब क
अलविदा बाबू निकम्मे भी थके
अलविदा सब बाबुओं की अफ़सरी
अलविदा सब राजनीतिक मसख़री
अलविदा आज़ाद औरत सुर्ख़रू
अलविदा घूँघट में सकुचायी बहू
अलविदा कॉलेज की सब ख़रमस्तियो
अलविदा आधी अधूरी हस्तियो
अलविदा ऐ पाँडवों मुग़लों के धन
अलविदा अंग्रेज़ के लूटे चमन
अलविदा खंडहर उजड़े मक़बरो
अलविदा सोये समय के पत्थरो
अलविदा गढ़ कोट कीली लाट को
अलविदा यमुना के प्यासे घाट को
अलविदा इतिहास की दहलीज़ को
अलविदा बूढ़ी हुई हर चीज़ को
अलविदा छ्त के कबूतर सीटियो
अलविदा संधों से निकली चींटियो
अलविदा ककड़ी कचौरी चाट को
अलविदा ढीली पुरानी खाट को
अलविदा झूठे व सच्चे ठाठ-बाठ
अलविदा नेताओं की हर साँठ-गाँठ
अलविदा ऐ धर्म की मायापुरी
अलविदा सारी सियासत की धुरी
अलविदा नंगे दिखावे बाँकपन
अलविदा तरसे हुए भूखे बदन
अलविदा ऐ चाँद से काटी छुरी
अलविदा ऐकमसिन संगत बुरी
अलविदा ओ याद की मचली सुबह
अलविदा ओ प्यार की पहली जगह
अलविदा बचपन की ओ लूटी पतंग
अलविदा ओ उम्र के माया-कुरंग
अलविदा हर चीज़ में धोखाधड़ी
अलविदा गुंडे व दादा की तड़ी
अलविदा दुश्मन के दिल कि सब जलन
अलविदा ऐ पेशगी पर रक्खे कफ़न
अलविदा फिर लौटने की आरजू
अलविदा मिलना वतन से रूबरू
अलविदा ऐ दोस्तो सब ख़ुश रहो
अलविदा कहकर कहो आते रहो


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