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05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
093

राजनिति के टिड्डी दल

राजनिति के टिड्डी दल चरते जनता के खेत
लोकतन्त्र है कागभगोड़ा या है वह हतचेत

गंगाओं को नये भगीरथ रखते अपने पास
छोड़ें वे जनता के तट पर अहसासों की रेत

चार पाँव दो की तुलना में होते दृढ़ आधार
कुर्सी पाना इस कारण है अब सबको अभिप्रेत

ख़ून सने पौधे वसुधा के घायल कोमल फूल
अर्पित करके इन्हें देश पर पूज रहे सब प्रेत

राम बने हैं वनवासी नित भरत रहें ननिहाल
सेवक राज भोगते डटकर भूखा है साकेत

सत्ता के आसन को देते निर्वाचन का नाम
मूरख है जो माने इसको आशा का संकेत

संविधान के मन्दिर में है आदर्शों की भीड़
तीरथ को रौंदा भक्तों के चरणों ने समवेत


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