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05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
092

मुक्तक

एकाकी अभिशप्त सदा से काँटे और कगार
पीड़ा जाने नींव खड़ी है जिसपर हर दीवार
धरती पगली रही समर्पित बेगाना नभ दूर
चाँद हँसा जब रो-रो उमड़ा दुख का पारावार

चाँदनी जिस चाँद की है कम नहीं खंडहर उसमें
डर लगे अमृत मिले तो हो कहीं न ज़हर उसमें
थे पड़े शरणार्थी-से ग़म कहीं बाहर हदों पर
दिल ज़रा उजड़ा बसाने आ गये ये शहर उसमें

ख़त नहीं संदेश ही भेजो ज़बानी कुछ तो हो
ज़ख़्म ही देते चलो कहकर निशाअनी कुछ तो हो
कोई धोखा या ज़रा-सी बदगुमानी कुछ तो हो
छेड़ते ही ख़त्म कर दो पर कहानी कुछ तो हो
फूल मत हो शूल से ही छेड़खानी कुछ तो हो
चार दिन की है जवानी आग-पानी कुछ तो हो

राह पर विश्वास के सन्देह का मृगजल न देना
बाँझ रह जाये धरा पर स्वार्थ के विषफल न देना
छीनकर अरुणाभ वेला श्याम अस्ताचल न देना
मौन की पीड़ा गहन पर रिक्त कोलाहल न देना


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