अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
05.22.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
091

बेकार मत हर छेद में

बेकार मत हर छेद में उँगली घुसेड़ तू
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू

उलझन बढ़ा मत ग़ैर की अपनी ही यों बढ़े
जैसे बुने हैं जाल सब वैसे उधेड़ तू

ख़ुशियाँ मिलें महफ़िल सजे तब साज़ शोभते
हो नाग सामने अगर बंसी न छेड़ तू

कुछ सीख सकता है अगर तो सीख पेड़ से
फल और छाया बिन बनेगा ठूँठ पेड़ तू

घोड़ चले तो याद रख चाबुक न मारते
जीवन रुके तो जोश की दे रोज़ एड़ तू

आशा जवानी है नहीं यह बीतती कभी
आशा नहीं तो बालपन में भी अधेड़ तू

डंगर हैं जो समाज के रख बाँधकर उन्हें
भूँकें अगर तो ले छड़ी दर से खदेड़ तू

होता वही इनसान जो इनसान बन सके
क्यों खाल ओढ़ता फिरे होगा न भेड़ तू


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें