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05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
089

दूर जाकर किस लिए तुम पास आये

दूर जाकर किस लिए तुम पास आये
टूटने पर काँच हरगिज़ जुड़ न पाये

फेरना आँखें मिटाने को बहुत है
और तुम ये कि लिए हथियार लाये

फूस की छत-सी तसल्ली थी तुम्हारी
दर्द की लम्बी झड़ी ने ज़ुल्म ढाये

आँख ने न्योता दिया कब आँसुओं को
आ गये मेहमान ये ख़ुद बिन बुलाये

झील ग़म की हो भले ही बहुत उथली
कौन है इसमें नहीं जो डूब जाये

लोग काँटा पाँव तक में सह न पाते
फूल इसके साथ रंगरेली मनाये

चीज़ पैसा है बुरी यह देख हम ने
देवताओं पर नहीं पैसे चढ़ाये

राह पकड़ी चाह ने हिम्मत बँधाई
पास मंज़िल के क़दम जा लड़खड़ाये


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