अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
088

लोग कितने भी बुरे हों

लोग कितने भी बुरे हों हम नहीं उतने बुरे
वे बने तलवार तो हम काठ के टूटे छुरे

मक़बरे में दर्द के हैं ज़ख़्म तक पत्थर बने
महल में सुख के लगे हैं संगमरम भुरभुरे

घाव करके वक़्त ने फाहे हमेशा ही धरे
हाल ज़ालिम ने लगाए पर बड़े ही खुरदुरे

थाम लेगा वह मुसीबत में भरोसा है हमें
उँगलियों में यार ने बाँधे न गर पैने छुरे

हिचकियों में पत्थरों से ख़ूब थे आँसू दबे
एक दिन करके बग़ावत वे बहुत निकले बुरे

आह का संगीत से रिश्ता हमेशा ही रहा
क्यों निकलते हैं सुरीले गीत अपने बेसुरे


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें