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05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
087

मुक्तक

हुई बीमार बुढ़िया अब पड़ी खंखारती माता
करें जयकार झूठा लुट रही भारती माता
बिकाऊ हो गई ममता दलाली कर रहे बेटे
उतारें सिर्फ़ मतलब से तुम्हारी आरती माता

उड़ें आकाश में अब वे लगाकर पंख चोरी के
चुराते हैं सभी आँखें सुनाकर छंद लोरी के
हुए हैं भक्त मक्खन-चोर के आदर्श यह उनका
वतन से जो मिले खा लो सभी अपनी कटोरी के

सपनों में छेड़ने की उसकी अजीब चाह
आँखों में आ न पूछे ले लूँ यहाँ पनाह
क्या-क्या चुरा रहा है मालूम तक नहीं
इन चोरियों को दुनिया कहती नहीं गुनाह

न हो जब स्नेह का बंधन
नहीं होगा कहीं तन-मन
रहेगी बाँझ यह धरती
न हो जब गगन में रोदन


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