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05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
086

वक़्त की हर इक छुअन से

वक़्त की हर इक छुअन से पाये हमने और घाव
याद की आई हवा दहका अधिक दिल का अलाव

दर्द को हमदर्द साथी नेक दिल यह क्या मिला
झेलकर हमले ख़ुशी के रोज़ कर लेता बचाव

रोज़ आहें भी भरीं मरता रहा या चाह से
यों किया दिल ने हमेशा इक मुसीबत का चुनाव

ज़ुल्म को भी आदमी अहसान क्यों माने नहीं
रोटियाँ दे अगा ज़ालिम का भला लगता स्वभाव

कोई सुन्दर है ज़रूरी तो नहीं अपना बने
पालने से साँप मालिक से नहीं रखता लगाव

आईने की ओट में है उम्र के दुश्मन छिपे
रूप का हर क़ाफ़िला लुट जाये जब डाले पड़ाव


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