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05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
085

रूप के क़ैदी बने

रूप के क़ैदी बने मीठी हमारी नज़रबंदी
प्यार से भूने गये हम बन गये हैं शकरकंदी

प्यार की बातें न समझे अक़्ल मंदी है हमारी
प्यार करना इस लिए कहते न होती अक़्लमंदी

एक तो सिर पर चढ़े हैं बाल तोता-चश्म भी हैं
झाड़ते जाते हमारी जो बक़ाया थी बुलंदी

यार ख़र्राट भरे तो कम नहीं संगीत उसमें
तालियों के साथ करनी चाहिए तब जुगलबंदी

प्यार यों तो कॉमिडी है ट्रैजेडी भी कम नहीं है
लार टपकाने लगे वह जब जताये नापसंदी

रोज़ पत्नी और पति में ज़रूरी चार बातें
प्रेम, नफ़रत, ख़ूब झगड़ा और झूठी जंगबंदी

आप से मिलकर नया इक चोर दिल में क्य घुसा है
सोचता है लूटने की आपको या बात गंदी


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