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05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
084

रोज़ वे आने लगे सपने बने

रोज़ वे आने लगे सपने बने
दर्द सारे ग़ैर थे अपने बने

उम्र बनती जा रही है आस्माँ
फ़िक्र के बादल लगे घिरने घने

क्या शिकायत आज दुनिया से करें
यार ही अपने घड़े चिकने बने

बाँध तो दिल ने बनाये हैं सभी
आँख से ग़म फूटते झरने बने

दुख अकेले थे कहीं दिल में पड़े
दो मिली आँखें उमड़ दुगुने बने

तोड़ते हैं हम नहीं रिश्ता कभी
ग़म बने अपने रहें अपने बने


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