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05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
083

रात काटी खिड़कियों में

रात काटी खिड़कियों में दर्द का दीपक जलाये
एक संगी था गगन क्यों नयन उसके डबडबाये

गोद में लेके अँधेरा
जब शिखा ने कुछ उकेरा
उड़ गया जुगनू बना वह दूर जाकर जगमगाये

पंथ निर्जन क्या सुनेगा
सिर्फ़ सन्नाटा बुनेगा
जो हवा संदेश लाई पास आकर भूल जाये


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