अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
082

देश, नेता, घोषणा, जयमाल हम हैं

देश, नेता, घोषणा, जयमाल हम हैं
भीड़, भोंपू, झंडियाँ, पंडाल हम हैं
लाभ पूँजी लूट हैं हम मालिकों की
झट अकारण हो गई हड़ताल हम हैं

तेल, चीनी, नमक, वेतन, प्याज़, आटा
जूतियों में बाँट सकते दाल हम हैं
भूख हैं हम झोंपड़ी, गठरी, ग़रीबी
नित ग़रीबों की उधड़ती खाल हम हैं

टूटती लगती रहे प्रतिमा हमारी
भक्त, पूजा, देवता, तर माल हम हैं
धर्म, विद्या, सभ्यता, इतिहास, पोथी
बेचने वाले सफल दल्लाल हम हैं

किरकिरी हैं आँख की रोकर रुलाते
आँसुओं के वास्ते रूमाल हम हैं
भ्रष्ट हम बेअक़्ल सेव वंशवादी
हर तरह कंगाल मालामाल हम हैं

जातियाँ, छोटे-बड़े, अपने-पराये
सब करें रक्षित मगर बेहाल हम हैं
संग तुम भी हो अकेले हम न भाई
एक दूजे के बने जंजाल हम हैं 


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें