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05.05.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
081

दिल न समझा क्या हुआ

दिल न समझा क्या हुआ क्यों छू गयी ग़म की क़लम
जख़्म को ख़ुद ही बना चाकू गयी ग़म की क़लम

फूल काँटों की सलीबें देख कर डरते नहीं
दीखती उनको मसीहा रूबरू ग़म की क़लम

रंग अम्बर की सियाही का न था सूखा अभी
पंखुड़ी से क्यों गिरा आँसू गयी ग़म की क़लम

तीर बनता है कभी या आस्माँ बनता कभी
घोलती है साँझ से टपका लहू ग़म की क़लम

देखकर हमको हँसे सब लोग यह कहते हुए
हो गयी सूरत तुम्हारी हूबहू ग़म की क़लम 


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