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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
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पीटता डंका शहर अपनी फ़तह का


पीटता डंका शहर अपनी फ़तह का
क़त्ल करता जागते ही हर सुबह का

लाओ मरहम आसमाँ जितना कहीं से
हाल बिगड़ा है ज़मीं की हर जगह का

सिर्फ़ पानी में घुली थोड़ी सफ़ेदी
ख़ून मिलता आजकल कुछ इस तरह का

कीजिए झगड़ा ज़माना कह रहा है
है लड़ाई ही तरीक़ा अब सुलह का

हो गया फ़ैशन नया नित प्रेम करना
सह नहीं पाता ज़माना दुख विरह का

ऐश के अंदाज़ में आहें निकलतीं
दर्द आलम का हुआ ऊँची सतह का 


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