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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
079

मुहब्बत का अगर दिल में

मुहब्बत का अगर दिल में न कोई वलवला होता
वतन को बेझिझक हमने बहुत लूटा-छला होता

बनाते काश हम बँगले पहनते हार नोटों का
जमा करते करोड़ों नाम अपन भी चला होता

चलो नेता नहीं उसके बटन-कुर्ता बने होते
हमें भी देशसेवा का मिला एक चोचला होता

सितारे तोड़ लाएँगे यही वादे किया करते
बनाते स्वर्ग की सीढ़ी सदा अपना भला होता

निकम्मे हैं मगर जनता हमें ही हर दफ़ा चुनती
जनम लेंगे कहाँ हमने किया गर फ़ैसला होता

लगाते हर जगह अपने चलाते ज़ात का सिक्का
न केवल हम हमारा वंश भी फूला-फला होता

वतन के वास्ते परदेस में ही दिल तड़पता है
पड़ा रहता अगर यह मुल्क में तो खोखला होता 


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