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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
078

दिल में पत्थर हों तो

दिल में पत्थर हों तो ख़ुद ही बनती हैं ऊँची दीवारें
मन में मेल न हो तो प्रेमी मिलकर भी रहते मीनारें

हथियारों से कब मरता है पिंजरे में भी हक़ जीने का
दिल जंगल की आग पकड़ते ज़ुल्मों की जब हों बौछारें

ज़िंदा रहने की कोशिश में जीना तक ही याद न रहता
जान सभी की खाये रोज़ी वक़्त कराता है बेगारें

अरमानों का गहरा सागर दिल है एक अनोखी कश्ती
चप्पू कच्ची आशाओं के साँसों की उखड़ी पतवारें

मेले की दूकानों जैसी सजें प्यार की मीठी रस्में
हर सौदे में पूँजी तक भी ख़ुश होकर व्यापरी हारें

नफ़रत प्रेम जलन चिन्ताएँ दुख लालच डर ग़म उम्मीदें
दिल ने भी रख लीं ये कैसी ख़ुद अपने ऊपर तलवारें 


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