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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
077

यह न थी हमारी क़िस्मत


यह न थी हमारी क़िस्मत की विसाले-यार होता*
दिल क्यों नहीं समझता कुछ होशियार होता

दिल घुट के मन न पाया यह दुख से टूट जाता
ग़म से तिरे उलझकर यूँ न तार-तार होगा

इक बार हाथ जिसके बेदाम बिक चुके हैं
वह चाहता है सौदा यह बार-बार होता

मिलना नहीं है मुमकिन क्यों दिल यह चाहता है
उन्हें इन्तज़ार होता हमें इन्तज़ार होता

फिर ख़्बाव टूटने पे हम खोलते न आँखें
दिल चाहता है यूँ ही लैलो-निहार होता

• मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल का मुखड़ा
१ रात-दिन 


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