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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
076

भूके सेवक माँ भारत के

भूके सेवक माँ भारत के बटुओं से करते प्रीत गये
जनता के चरण पकड़ते थे उनके सिर चढ़कर जीत गये

जग को परिवार बताते थे यह कहकर तुम अब अपने हो
अभि’नेता’ थे सं-’वादों’ के बन चारण का संगीत गये

सिक्के थे उनके लौह कवच सिक्कों के तीर चलाते थे
माया के आगे सब उनकी दुनिया में हो भयभीत गये

टूटे चीनी के बरतन ही वे चमचे बनकर अमर हुए
डूबे रहकर पकवानों में मलते सबको नवनीत गये

घातों की महफ़िल दुनिया में चिकनी-चुपड़ी ने काम किया
बोले कोयल की बोली में हर महफ़िल का दिल जीत गये

नीचे उनके फ्ल गिरे नहीं अद्भुत हैं पेड़ तरक़्क़ी के
छाया भी सब ऊपर फैली जो बीच पके विपरीत गये

आई धरती पर गद्दी बन देवी नवयुग की चतुष्पदी
कुर्सी की पूजा को करता उसके सारे दुख रीत गये 


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