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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
075

न समझी किसी ने नदी की कहानी

न समझी किसी ने नदी की कहानी
कहाँ पत्थरों में हुई पानी-पानी

मिली रात किससे किसे यह पता है
सुबह सिर्फ़ फूलों पे मिलती निशानी

समझती है तक़लीफ़ मिट्टी वहाँ की
रिसे छप्परों से जहाँ रोज़ पानी

लगी वक़्त की होड़ क्या आँसुओं से
कि लम्हों की रुकने लगी है रवानी

उधर याद निकली हुई दीमकों-सी
इधर दिल की भीगी है पोथी पुरानी

कलेजे से अब पत्थरों को लगाएँ
इन्हें सौंपनी पड़ गई ज़िंदगानी

नदी दिल की पलकों के कच्चे कगारे
नहीं बात अब चल सकेगी ज़बानी 


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