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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
074

धूप की बहँगी लिये बीमार दिन

धूप की बहँगी लिये बीमार दिन
रोज़ निकला और भी बेज़ार दिन

हर सुअबह ताज़ा ख़बर जैसी लगे
झट महर बासी लगे अख़बार दिन

हर जगह किरचें अँधेरे की गड़ीं
देखकर निकला करो दिलदार दिन

फूल ममता के व आँचल छाँह का
भूलते अब तक नहीं छतनार दिन

हर सवाली हाथ फैलाये खड़े
एक मुट्ठी सिर्फ़ दे दो प्यार दिन

तुम अँधेरे से न करना दोस्ती
चाँदनी के पास हैं कुल चार दिन

बंद कलियाँ हो रहीं दीदार से
और मत करना नज़र के वार दिन

मान ले विनती सवेरे की हवा
कुछ बढ़ा दे और ख़ुशबूदार दिन

वे न वादा कर गये पर क्या पता
लौट आएँ कर गये जो प्यार दिन

कौन-से पल दर्द क्या देकर गये
पूछकर अब क्या करोगे यार दिन 


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