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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
073

पालायन

आये नभ के नयन भर घर छोड़कर जब हम चले
क्या कहें दीवार दर घर छोड़कर जब हम चले

साथ अपने जिस्म को हम खींचकर चलने लगे
रह गया दिल ताक पर घर छोड़कर जब हम चले

मुश्किलों के पत्थरों का बोझ उठता ही न था
हो गई दुहरी कमर घर छोड़कर जब हम चले

आफ़तें बरसी गिरीं फिर संकटों की बिजलियाँ
था ज़माना बे-मेहर घर छोड़कर जब हम चले

ढेर तकलीफ़ें लिए दुःखों की लादे गठरियाँ
काफ़िले आये नज़र घर छोड़कर जब हम चले

भीड़ चलती थी गिराती आँसुओं को राह में
धूल बनती थी ज़हर घर छोड़कर जब हम चले

लोग चिथड़ों में दिखे ज्यों कफ़न लिपटी ठठरियाँ
आँख थी हर एक तर घर छोड़कर जब हम चले

काँच जैसे थे सभी हम और खाते ठोकरें
चुभ गईं किरचें बिखर घर छोड़कर जब हम चले

राह में हमला न हो लुट जाये न इज़्ज़त कहीं
थे बहु अज्ञात डर घर छोड़कर जब हम चले

छाँह में नभ की कहीं बिस्तर बनाते राह को
लोग जाते गिर पसर घर छोड़कर जब हम चले

भीड़ दहशत भूख दुख सब रोग हाहाकार भी
संग थे अपने सगर घर छोड़कर जब हम चले

राजनीतिक खेल में हम बन गये थे गोटियाँ
ज़िंदगी थी दाँव पर घर छोड़कर जब हम चले

देश अपना था मगर वह बन चुका परदेस था
लुट गया सब माल ज़र घर छोड़कर जब हम चले

हम ढलानों से धकेले जा रहे थे खड्ड में
छिन गये अपने शिखर घर छोड़कर जब हम चले

झाड़ियों की मील के पत्थर समझकर हम बढ़े
थी कठिन लम्बी डगर घर छोड़कर जब हम चले

रात को आते यही सपने कि अर्थी उठ गई
जी रहे थे रोज़ मर घर छोड़कर जब हम चले

वक़्त क़ातिल था हुआ या वक़्त का ही क़त्ल था
था बड़ा ज़ालिम पहर घर छोड़कर जब हम चले

जल गईं सब चाहतें अरमान सारी हसरतें
ख़ाक दिल का कोहबर घर छोड़कर जब हम चले

धर्म की चौपड़ बिछा कर राज ने पाँसे गढ़े
कौन करता ना-नुकर घर छोड़कर जब हम चले

जा रहा अंग्रेज़ घर अपने किया बेघर हमें
ले गया सर्वस्व हर घर छोड़कर जब हम चले

काटकर धरती फिरंगी ए दिये नक़्शे नये
ख़ून से थे तर-बतर घर छोड़कर जब हम चले

सरहदें ख़ंजर बनीं सब का गईं आबादियाँ
बस्तियाँ थी खंडहर घर छोड़कर जब हम चले

लुट गये अग़वा हुए मारे जला डाले गये
नित यही सुनते ख़बर घर छोड़कर जब हम चले

कौन फिसला या गिरा या कौन कुचला जा रहा
कोई न देखे ठहर घर छोड़कर जब हम चले

माँ अलग बच्चे अलग अपने न जाने थे कहाँ
मौत ही थी हमसफ़र घर छोड़कर जब हम चले

औरतें लुटती गईं या डूब कुओं में मरीं
बाप-भाई दें ज़हर घर छोड़कर जब हम चले

मुँह करें काला दरिंदे और काटें छातियाँ
औरतें वे घेरकर घर छोड़कर जब हम चले

खाल ओढ़ी जानवर की आदमी शैतान थे
कुछ न थी बाक़ी कसर घर छोड़कर जब हम चले

नस्ल सबकी एक थी ख़ूँख्वार थे सब एक-से
गिद्ध कुत्ते और नर घर छोड़कर जब हम चले

काटते गहने शवों से जीवितों को नोचते
वे बने पागल मकर घर छोड़कर जब हम चले

बन गये क़ब्रें कुएँ मरघट बनीं नदियाँ सभी
ख़ून के नाले नहर घर छोड़कर जब हम चले

तैरते लँगड़े व लूले ख़ून के तालाब में
झेल हमलों की लहर घर छोड़कर जब हम चले

लोग रो-धो राह में शव छोड़्ते या फूँकते
देखकर ठिठके शजर घर छोड़कर जब हम चले

पेड़ अंगों के शवों के थे वहाँ जंगल उगे
ज़ख़्म थे हर मोड़ पर घर छोड़कर जब हम चले

मौत पहरे पर खड़ी थी मौत का ही राज था
मौत डुलवाती चँवर घर छोड़कर जब हम चले

मर गई इनसानियत जब जीत मज़हब की हुई
थे पुजारी जानवर घर छोड़कर जब हम चले

नाम पर सब धर्म के क़ैंची व चाक़ू बन गये
ख़ून तक देते कतर घर छोड़कर जब हम चले

राज बदले हैं मगर जनता नहीं बदलती कभी
यह न सच आया नज़र घर छोड़कर जब हम चले

वह न मिट्टी ही फटी टुकड़े दिलों के हो गये
टूटते देखे जिगर घर छोड़कर जब हम चले

मुल्क की तक़्दीर की कुछ यूँ लकीरें खिंच गईं
आईं दीवारें उभर घर छोड़कर जब हम चले

ठीख आज़ादी करे क्या रोग था तक़्सीम का
कर गई उल्टा असर घर छोड़कर जब हम चले

दूर था भारत गगन में टिमटिमाता ज्यों कहीं
हम परिदों के न पर घर छोड़कर जब हम चले

जान थी आधी यहाँ तो जिस्म था आधा वहाँ
कुछ इधर था कुछ उधर घर छोड़कर जब हम चले

चीख़ते रोते इधर हम लोग हँसते थे उधर
सीलिए अपने अधर घर छोड़कर जब हम चले

खंदकें थी उस तरफ़ तो इस तरफ़ थी खाइयाँ
काल कबजता गजर घर छोड़कर जब हम चले

राजनीतिक आग में सब घोंसले बिरवे जले
राख थे सब गुलमुहर घर छोड़कर जब हम चले

जुर्म क्या था किस लिए हमको जलावतनी मिली
फिर न जा सकते उधर घर छोड़कर जब हम चले

था ग़दर वह जब कि सने जंगे-आज़ादी लड़ी
कौन-सा था यह ग़दर घर छोड़कर जब हम चले

ख़ून के आँसू बहे तो लाल आज़ादी हुई
घुल गया सुख में ज़हर घर छोड़कर जब हम चले

देश छोटा हो गया पर हो गये नेता बड़े
सब गये वादे मुकर घर छोड़कर जब हम चले

देश में सबको सुरक्षित ला सके नेता न क्यों
क्यों हुए वे बे-हुनर घर छोड़कर जब हम चले

देश अपना भी हमें कहने लगा शरणार्थी
रह गये बनकर सिफ़र घर छोड़कर जब हम चले 


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