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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
072

दिल न जो दे पाये अपना

दिल न जो दे पाये अपना आदमी अपना नहीं है
रोज़ दिखला जाये सपना आदमी अपना नहीं है

बैठते ख़ामोश हैं वे इसलिए अब दोस्तों में
हो सके आसान कहना आदमी अपना नहीं है

हाथ वे पकड़े हुए हैं किस तरह मासूमियत से
और कहते हैं यह अदना आदमी अपना नहीं है

रोज़ वे घर में बुलाकर रोज़ कहते हैं सभी से
देखलो इसका चिपकना आदमी अपना नहीं है

प्यार की ख़ासियतर बेकार में इनकार करना
और यह भी कह न सकना आदमी अपना नहीं है

आये कर मेरी सिफ़ारिश लोग ऊपर अफ़सरों से
जानता है काम करना आदमी अपना नहीं है

ग़ैर से क्योंकर शिकायत कीजिए बेगानगी की
आदमी अब ख़ास अपना आदमी अपना नहीं है 


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