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05.01.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
071

पाइये भाई मिले जो बंदगी से

पाइये भाई मिले जो बंदगी से
तोड़िय दुनिया न ये दीवनगी से

साज़िशों से हो नहीं सकती भलाई
हो रहे टुकड़े दिलों की गंदगी से

आदमी पत्थर नहीं क्यों तोड़ डाले
आईने तहज़ीब के नाराज़गी से

"जब सिखाता है न मज़हब बैर रखना"*
क्यों बढ़ाये दुश्मनी बेगानगी से

गोलियाँ हों और फूलों से बनी हों
ज़ख़्म होते कम नहीं इस दिल्लगी से

पत्थरों ने राह दी है कब ख़ुशी से
देश बढ़ते हैं न कोरी पिछलगी से

पार्टी व क़ौम को क्या दे सकेगी
लीडरी जिसमें चली है मुँहलगी से

लोग अब पूरे न देखे जा सकेंगे
रूह कटई जा रही है ज़िंदगी से

है कहाँ अब उस हिमालय की बुलंदी
देखते थे सब जिसे हैरानगी से

*इक़बाल का विचार 


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