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04.20.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
069

धुंध का बुर्क़ा पहनकर

धुंध का बुर्क़ा पहनकर आई बरतानी सुबह
पेड़ पर बैठी परोम का झाड़ती पानी सुबह
बहुत रोका और सोने दो नहीं मानी सुबह
आय परदों से छनी कुछ चाय में छानी सुबह

आ ढुलकती है छ्तों से घास पर शबनम सुबह
वक़्त के हर टाट पर बिछ जाय बन रेशम सुबह
जिस डगर टिक जाय उसका दे बदल मौसम सुबह
काम पर भेजे सदा होकर बड़ी निर्मम सुबह

मोटरों की दौड़ में दुबकी रहे सहमी सुबह
याद करके आदमी की रोज़ बेरहमी सुबह
भीड़-भब्भड़ में गई कुचली कहीं वहमी सुबह
फिर नया दिन आ गया होती ग़लतफ़हमी सुबह

गाँव की अल्हड़ छरहरी मस्त पगडंडी सुबह
चंद मिनटों में लगा दे रूप की मंडी सुबह
प्रेम करना सोचकर है बहुत पाखंडि सुबह
जब लगी हल्दी हुई झट साँवली ठंडी सुबह

ज़ख़्म सपनों के भरे फाहे धरे गीली सुबह
धूप से मिलक्र हुई कुछ और भी सीली सुबह
भागने पर हो रही मजबूर पर ढीली सुबह
ताकती मुड़-मुड़ मगर रुकती न शर्मीली सुबह 


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