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04.20.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
068

न मिलता कहीं आदमी गुमशुदा है

न मिलता कहीं आदमी गुमशुदा है
जिसे देखिए बन गया वह ख़ुदा है

रहे जान बनकर मगर वह जुदा है
कहें क्या उसे वह सभी का ख़ुदा है

किसी फूल को देखकर यह समझ लो
खीला इक इरादा बड़ा गुदगुदा है

न हम पत्थरों पर कभी देक पाये
ज़माने का दुख-दर्द कितना खुदा है

कहे सूरतों को बदलकर ज़माना
यहाँ असलियत वाक़ई गुमशुदा है

नहीं डर हमें अन्त कब है हमारा
टलेगा न हरगिज़ अगर तयशुदा है 


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