अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
04.20.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
067

ज़िंदगी होती सदा मेहमान क्या

ज़िंदगी होती सदा मेहमान क्या
साथ चल साँसें करें अहसान क्या

बाँधतीं आशाएँ कितनी गठरियाँ
जा सकेगा साथ सब सामान क्या

काम अपना ख़ूब आँखें कर चुकीं
आप समझे बात इत्मीनान क्या

ठूँठ बनते हैं यहाँ सब वायदे
ज़िंदगी होगी नहीं विरान क्या

सूख जाये आस की मन में लता
नाम उसका है न रेगीस्तान क्या

आन हो जिसमें न कुछ अभिमान हो
आदमी उसका करे सम्मान क्या

घाट पर आशा न लगने पायेगी
दर्द का होगा वहीं शमशान क्या

आँख को दे दे ज़रा यह रोशनी
हुस्न का हो जायेगा नुक़्सान क्या

पत्थरों में आदमी मिलता नहीं
खोजना उनमें भला भगवान क्या


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें