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04.20.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
066

पाँव मेरे बेतुके हैं

पाँव मेरे बेतुके हैं
फूल बिछते ही रुके हैं

कुछ ख़ुदा वे भी हुए हैं
जो सलीबों पर ठुके हैं

झोंपड़े जलते न उनसे
बिजलियों से दिल फुँके हैं

प्यार होना दो दिलों में
वे ज़माने लद चुके हैं

सिर उठाकर हम कहेंगे
जब कटे हैं तब झुके हैं 


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