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04.20.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
065

जहाँ की रात ज़ालिम हो

जहाँ की रात ज़ालिम हो वहाँ क्या दिन रहा होगा
पड़ा ज़ख़्मी कहीं पर चाँद तारे गिन रहा होगा

हमारी रात रहने दो गया जो दिन रहा होगा
वही खुशियाँ चुराकर भी कहाँ मुहासिन रहा होगा

हमें तो रात दिखती है तुम्हारा दिन रहा होगा
कभी अब हो न दिन जब सब उजाला छिन रहा होगा

रहेगी रात क्या बाक़ी नहीं जब दिन रहा होगा
कि जीना तक न जिसके बाद कुछ मुमकिन रहा होगा 


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