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04.20.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
064

जागती है याद में रह-रह

जागती है याद में रह-रह मधुर-सी कसक कोमल
कूकती है जिस तरह से जुगनुओं के बीच कोयल

रागिनी का रजत आँचल
गुनगुनाती किरण पल-पल
फिर मिलन-मिज़राब ने छेड़ी कहीं पर बाल-कोंपल

दीप धुँधले स्वप्न उज्ज्वल
रेशमी बंधन अमांसल
आँख को चुपके बुला जाता कुँवारा रूप बादल

नूपुरों में सुरभी देवल
घाटियों के गात उत्पल
फिर धरा नभ से मिलन के कर रही संकेत पेशल


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