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04.20.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
061

आया ख़याल बनकर

आया ख़याल बनकर दिल में उतर गया
इक ख़्वाब ख़ुदकुशी से पहले ठहर गया

उम्मीद है मिलेगा वह वक़्त भी कभी
वादा किया था जिसने लेकिन मुकर गया

मिलती न माँगने से हरगिज़ कहीं ख़ुशी
ख़ुद ढूँढने उसे यों मैं दर-बदर गया

होते ही चार आँखें दो दून दो मिटे
होंटों पे ये पहाड़ा बनता सिफ़र गया

तन्हाइयाँ डगर पर मिलती रहीं हमें
हँस बोलकर इन्हीं से कटता सफ़र गया

क्या सोचकर समय ने दो पल दिये हमें
इक जान ले रहा है इक चैन हर गया

लम्बा था उम्र जितना साँसों का रास्ता
चलना शुरू किया तो पल में गुज़र गया


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