अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
04.15.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
060

घूँघट डाले शाम हुई

घूँघट डाले शाम हुई
धूप कहीं नीलाम हुई

भाप छुई है चश्मे से
या ग़म का अंजाम हुई,

सूरज धरती मिलें जहाँ
लम्बी जै-जै राम हुई

कत्था दिन चूना बदली
ख़ुश्बू मिली किमाम हुई

लौटी थकी हुई चिड़िया
गुमसुम अर्द्ध विराम हुई

झुक-झुक चल रुक-रुक नदिया
करती दूर सलाम हुई

जोगन होकर बौर लदी
डाली प्राणायाम हुई

मेहँदी लगी नवेली को
रँगे हाथ बदनाम हुई

छैयाँ पेड़ों से मिलती
खेतों में इल्ज़ाम हुई

ताक-झाँक कर गुज़र गई
क्योंकर नींद हराम हुई


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें