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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
058

आदमी मज़बूत है

आदमी मज़बूत है इनसानियत कमज़ोर क्यों
पालता इनसान दिल में जानवर या ढोर क्यों

ख़ून क्या इनसान का होता बहाने के लिए
आदमी खते जिसे बन जाये आदमख़ोर क्यों

दौलतें इनसान की हैं सागरों से कम नहीं
मोतियों के साथ जाये डूब ग़ोराख़ोर क्यों

तार दिल के छेड़ता तन-मन मगन करती धुनें
हो गया संगीत यह मुँहज़ोर केवल शोर क्यों

क्यों सियासत हो गई है लूट या डाकाज़नी
लोग सेवा के बहाने बन गये हैं चोर क्यों

सिर झुकता है सदा जो देवता के सामने
दूसरों को देखकर हो जाये सीनाज़ोर क्यों

फूल मचलें और ख़ुश्बू को उजाला मिल सके
यों ख़ुशी के साथ होती है न सबकी भोर क्यों

शौक़ जीने का भरा जिसने व दीं सब नेमतें
ज़िंदगी की इस तरह कच्ची बनाता डोर क्यों

धूप जीवन भर हमारा साथ देती है कहाँ
आख़िरी दम छाँह अपनी छोड़ जाती छोर क्यों


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