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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
057

ज़िंदगी समझे जिसे हम

ज़िंदगी समझे जिसे हम आह निकली
ख़ूबसूरत थी ख़बर अफ़वाह निकली

चाहतों की नाव दरिया दलदली था
और मंज़िल ख़ुश्क बंदरगाह निकली

वाह क्या तक़्दीर ने यह दी हवेली
खंडहर बनती हुई दरगाह निकली

ले गई उम्मीद फुसलाकर जहाँ भी
था मरुस्थल और वह गुमराह निकली

बंद बटुए में दिया जो ज़िंदगी ने
खोलने पर दर्द की तनख़्वाह निकली

भूलकर सुख यह नये दुख दे गई है
ज़िंदगी भी कम न लापरवाह निकली

ख़ूब देखे हैं नज़ारे इस जहाँ में
ज़िंदगी अच्छी तमाशागाह निकली



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