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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
056

रोशनी लेती सुबह अँगड़ाइयाँ

रोशनी लेती सुबह अँगड़ाइयाँ
ख़ुश्बुएँ रस घोलती शहनाइयाँ

चुप अधर दोहे दिलों के रच गये
चार आँखें रच गईं चौपाइयाँ

रूप को लगती ज़रा ज्यों ही हवा
आयेंगे दौड़े शिकारी काइयाँ

थाह मिलती है न कोई प्यार की
और भी बढ़ने लगें गहराइयाँ

जब मिले उनसे लगा डर साथ में
झेलनी पड़ जाएँगी तन्हाइयाँ

आपके वादे न कम बरसात से
आस की सूखीं मगर अमराइयाँ

हम बुराई को बुरा कैसे कहें
हारती देखीं यहाँ अच्छाइयाँ

मंज़िलें "गौतम" न मिल सकतीं तुम्हें
राह में खोदते ख़ुद खाइयाँ


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