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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
054

हम कहाँ थे और अब

हम कहाँ थे और अब आये कहाँ देखा नहीं
देखकर यह क्यों लगे हिन्दोस्ताँ देखा नहीं

रास्ते ख़ुद बन गये हैं मंज़िलें कुछ के लिए
रास्ते ख़ुद बन गये हों कारवाँ देखा नहीं

फूल मुँह से हैं बहुत देखे मगर झड़ते हुए
लोग काँटों को छुपा रखते कहाँ देखा नहीं

बात काफ़ी है किसी का दिल जलाने के लिए
बात लगने पर उठा कोई धुआँ देखा नहीं

ख़ून फूलों का कभी काँटे किया करते नहीं
ख़ून करता हो न उनका बाग़बाँ देखा नहीं

काटते फिरते गले बेदर्द क्या हमदर्द भी
हो मगर बेग़र्ज़ कोई मेह्रबाँ देखा नहीं

ख़ून में गरमी इधर हो ख़ून हो प्यासा उधर
ख़ून बह जाए न उनके दरमियाँ देखा नहीं

नाव डूबे या दुखों में डूबता विश्वास ही
आस का डूबे तब बादबाँ देखा नहीं

हाथ फैलाती बिछाती रह गईं आँखें सदा
क्या ज़मीं को मिल गया है आस्माँ देखा नहीं


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