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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
053

शाम आई सुरमई

शाम आई सुरमई
गिर गये परदे कई

दिन थका-माँदा गिरा
और कितनी दे ढई

संकुचित सुस्ता रही
खोल श्यामा मिरज़ई

वक़्त की परतें खुलीं
कुछ पुरानी कुछ नई

छाँह छूकर खुल गई
इक लजीली सतसई

चाँदनी नभ छोर पर
रख रही ख़बरें कई

चल पड़ी जल्दी कहाँ
सुन अरी अल्हड़ सई!


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