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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
052

लोग दुनिया में नयापन ला रहे हैं

लोग दुनिया में नयापन ला रहे हैं
अब मुखौटे सूरतें कहला रहे हैं

जंग करके वे अमन फैला रहे हैं
शहर क़ब्रिस्तान में ले जा रहे हैं

चल पड़े हैं शेर की दहशत मिटाने
चींटियों को तोप से उड़वा रहे हैं

प्यार गिरगिट से सभी करने लगे हैं
आदमी रंगीन बनते जा रहे हैं

दूर हरदम रह सकें जग के ग़मों से
चाँद पर अब लोग रहने जा रहे हैं

ख़ून से सींचे न फिर मुरझा सकेंगे
फूल वहशत के खिलाये जा रहे हैं

मौत को नित याद रखना है ज़रूरी
डूबने को सब कुएँ बनवा रहे हैं

वे न ठेकेदार जग के बन सके थे
देश को चूना मगर लगवा रहे हैं

दावतें हों जश्न या मौक़े ख़ुशी के
सिर्फ़ धोखा हम वहाँ खा रहे हैं


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