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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
051

लेखक और प्रकाशक का है

लेखक और प्रकाशक का है रिश्ता बड़ा अनोखा
होता ख़ुश इक खाकर धोखा दूजा देकर धोखा

गन्ने जैसी लेखक की भी अजब तमन्ना होती
कोल्हू को तरसे जो इसका रस पेरेगा चोखा

पागल है छपने को लेखक रख अनमोल ख़ज़ाने
सेंधमार के लिए खोलता घर का द्वार झरोखा

लेखक है बेताब हसीना लुटने पर भी ख़ुश है
स्पंज प्रकाशक छोड़े फिर क्यों सब रस उसने सोखा

रॉयल्टी लेखक की बीवी उसके पास न आये
चीर प्रकाशक करे हरण रख झूठा लेखा-जोखा

औरत बदन बेचने पर भी कुछ तो पैसे पाये
लेखक पैसे देकर बिकना माने काम अनोखा


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