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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
050

लंदन के फ़ुटपाथों पर सोने वाले

शंख औंधे जा पड़े इस-उस किनारे
लहर के छोड़े हुए सूने पिटारे

भूख कुतिया-सी न छोड़े साथ इनका
बीनते पत्तल फिंकी से नमकपारे

रात गुज़री पा से अभिसारिका-सी
चाहिए उसको नहीं ये चिर-कुँवारे

मूतने तक को मिले न एक कोना
रोशनी बेचैन हो-होकर निहारे

देखता एकाध कोई भीख देकर
कौन है उम्मीद की टोपी पसारे

दर्द समझा कब खड़ा असमर्थ खंभा
टूटते बेकार डिब्बों में सितारे


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