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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
049

रास्ते अपने न कोई

रास्ते अपने न कोई कारवाँ अपना हुआ
ठोकरें खाते रहे यह इम्तिहाँ अपना हुआ

गुलिस्ताँ अपना न कोई शबिस्ताँ अपना हुआ
था बुरा लेकिन भला है जो समाँ अपना हुआ

उम्र भर अपना न बन पाया बहुत चाहा उसे
छोड़कर चलते समय ज़ालिम जहाँ अपना हुआ

कुछ मुहब्बत की सज़ा थोड़ा वफ़ाओं का सिला
ये मिले कोई यहाँ जब मेह्रबाँ अपना हुआ

होम करने पर जले हैं हाथ हम किससे कहें
हाथ रखने से शमा पर कुछ धुँआ अपना हुआ

ज़ुल्म से कुचला हुआ दिल बच नहीं सकता कभी
ख़ून से मगर यह नातुवाँ* अपना हुआ

तू न दे मिट्टी हमें पर जान है तेरे लिये
जाएँगे कहते सदा हिंदोस्ताँ अपना हुआ

नुतवाँ=अशक्त


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