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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
048

रंगभेद की दुश्मन होली

रंगभेद की दुश्मन होली काला बचे न गोरा रंग
क्या समझे रंगीन जगत् की मेमों का यह छोरा रंग

नीली झील धूप है पीली फूल खेलते नित होली
कुदरत रूप जगाये सबमें नया अँजोरा रंग

गगन-कन्हैया इंद्रधनुष की पिचकारी से खेल रहा
राधा-धरती के तन मन में भरता नव हिलकोरा रंग

रेगिस्तानों की आँखों में सपने हैं बेरंग नहीं
वर्षा की दो बूँदें पाकर पीटें ख़ूब ढिंढोरा रंग

मौसम से मिलने को आतुर हरियाली का घूँघट खींच
पतझड़ ने करके बरजोरी सब-का-सब झकझोरा रंग

रात चाँदनी तारे खेलें होली जब सन्नाटे से
बाँधे प्रियतम और प्रिया को अद्भुत कच्चा डोरा रंग

दिल की चादर पर करता है प्यार कशीदाकारी-सी
विरह-मिलन का फ़र्क मिटाता फिर तोरा क्या मोरा रंग

चुटकी काटे करे गुदगुदी ग़ैरों की उठ पकड़े बाँह
आँखों में आँखें भी डाले क्या-क्या करे निहोरा रंग

रंग न हो तो रूप नहीं शृंगार नहीं रस राग नहीं
क्या से क्या कर देता सबका कहने को है कोरा रंग

गिरगट को बदनाम किया क्यों रंग बदलता हर कोई
मन की मैल न रहने देता खेलो एक कटोरा रंग


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