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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
047

मौत का है एक वादा

मौत का है एक वादा ज़िंदगी के सौ बहाने
रोज़ दिल को आ डरायें दर्द के जंगल पुराने

सिर्फ़ ख़ुशियाँ बाँटने को फूल बेपर्दा हुआ है
लूटते हैं लोग बढ़ कर हुस्न जो लगता दिखाने

दर्द से जितना बचाओ दिल बने कमज़ोर उतना
काँच की हों खिड़कयाँ पत्थर बनाते हैं निशाने

सीवनें कच्ची समय की पोथियाँ फट जाएँ जल्दी
चार-छः पन्ने न जाने याद क्यों लगती बचाने

सारथी बनकर मिले वे ज़िंदगी की थी लड़ाई
यार गीता पर मगर सब लिख गये हैं मेहनताने

दर्द दिल के वे न दिल में वास करके देखते हैं
देवता आते सदा दो-चार दिन छुट्टी बिताने


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