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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
046

हर आदमी यहाँ पर

हर आदमी यहाँ पर कुछ बदनसीब है
कैसा अमीर है वह दिल से ग़रीब है

राहें मिली न हमको रहबर थे कम नहीं
क्यों दौर यह नया भी इतना अजीब है

लौ दिल में जल उठे गर छू जाये रोशनी
होती शमा मगर यह किसको नसीब है

क्यों मानता न दिल यह दुनिया सिमट गई
है दूर आज तक यह जितनी क़रीब है

तक़लीफ़ में अकेले तड़पे न हम कभी
आया सँभालने को दिल का सलीब है

अव्वल तो छप न पाये लुट जाये गर छपे
हिन्दी का यह बिचारा कैसा अदीब है



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